Naari


आज उसने अम्बर धरा को प्रयत्नो की सीढ़ी से मिलाया हे।
फिर भी ये समाज उसके महत्व को न समझ पाया हे।
आज बार बार घिर जाती हे वह दूषित नज़रो से
उसकी आबरू रोंधी जाती हे ना जाने कितने कदमो से।
निर्दोष होकर भी न जाने कितने दर्द सहती हे।
दर्द का हर आँसू मन की गंगा में डुबो देती हे।
उसकी  ख़ामोशी को कमजोरी न समझना,
क्यूंकि संत सागर का संकेत होता हे तूफान का आना।
इस तूफान के समक्ष फिर कोई न टिक पायेगा
ओऱ ऐसे समाज का अश्तित्व भी नष्ट हो जायेगा।
कुप्रथाओ की आह ने उसे कितना झुलसाया हे,

ना जाने उसकी आजादी पर कितने ही पूर्णविरामो का साया हे।
ना जाने सामाजिक बंधनो ने उसे कितना जकडया हे ,
फिरते भी उसकी प्रयत्नशीलता ने विजय पताका लहराया हे।
हर बढान के बोझ से कर लेती अपना जीवन भरी ,
भूमिकाएं निभाती हे वो हे नारी



Written By: Deepika Solanki
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